बापू ने देश में आज़ादी की लड़ाई से पहले इस देश मे रहनेवालों और उनकी समस्याओं को करीब से देखना चाहा, उन्होने भारत भ्रमण किया, गांव- गांव, कस्बों-कस्बों में लोगों से मुलाकात की उन्हे महसूस हुआ कि भारत गांव में बसता है और अगर इसका विकास करना है तो पहले गांव का विकास करना होगा । इस बात को कई दशक बीत चुके,आज़ादी के बाद हमारी अपनी सरकार बनी,लगा सबकुछ बदलने वाला है बापू की बातें अब हकीक़त का रूप लेने वाली हैं । समय का पहिया घूमा भारत “इंडिया” में बदलने लगा । शहरों में उंची उंची इमारतें , आलीशान होटल्स , बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ बसने लगी । लोगों के रहन सहन में बदलाव आने लगा। लेकिन भारत तो वहीं का वहीं का रह गया गांव में । राजनीति में भी बदलाव आया, मुद्दे बदलने लगे,उद्देश्य बदलने लगे,कभी भारत की खातिर राजनीति हुआ करती थी अब भारत के सहारे राजनीति होने लगी । आज भी “गांधी “ निकलते हैं गांव के दौरे पर लेकिन एसी कमरों से । दलितों के घर में रात गुज़ारते हैं उनकी व्यथा-कथा पर अच्छा खासा भाषण देते हैं उनकी हालत पर अफसोस जताते हैं अफसोस की इस सूची में कभी कलावती तो कभी शशिकला का नाम जुड़ जाता है ये “गांधी “ अपने भाषण में ये बताना नहीं भूलते कि ये ग़रीब दलितों की पीड़ा है । इनकी इस हालत के लिये वो दूसरे दलों की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं । गांव में लोगों की समस्या सुन उसे दूर करने का आश्वासन देकर उड़न खटोले से वापस लौट जाते हैं । कलावती, शशिकला मीडिया के लिये खबर बन जाती है कोई इसे गरीब दलितों का हाल जानने का एक अच्छा प्रयास बताता है तो कोई इसे सियासत का हिस्सा । कलावती को आस जगती है कि अब उसका कुछ भला ज़रूर होगा, ऐसे में साल बीत जाता है लेकिन बदलता कुछ नहीं, हां राजनीति में कदम रखने वाले “गांधी” सियासत में परिपक्व होते जाते हैं, कब, कहां और कैसे राजनीतिक फायदे के लिये भारत की नब्ज़ पकड़नी है वो सीख जाते हैं । एक साल बाद “गांधी” फिर से गांव के दौरे पर निकलते हैं जहां इस बार विद्यावती उनका इंतज़ार कर रही होती है फिर से मीडिया कैमरों के फ्लैश चमकने लगते हैं ” गांधी ” गरीब दलितों की पीड़ा पर अफसोस ज़ाहिर करते है । विद्यावती को लगता है कि इस “गांधी” की तो केन्द्र में सरकार है जो हमारी तक़दीर बदल सकती हैं लेकिन विद्यावती को एहसास कराया जाता है कि राज्य में तो दलित मुखिया की ही सरकार है फिर भी तुम्हारी ऐसी हालत है, ऐसे में सरकार बदले बगैर वो उनकी ज्यादा मदद नहीं कर सकते । आज़ादी के बाद से दशकों तक देश में “गांधी” की पार्टी का ही शासन रहा फिर भी कलावती और विद्यावती को अपने हालात बदलने का अब तक इंतज़ार क्यों है ? इस पर “गांधी” खामोश रहते हैं । दरअसल इस गांधी के पास उसका जवाब नहीं क्योंकि इस “गांधी” और दशकों पुराने उस गांधी में काफी फर्क है वो महात्मा गांधी थे जिनके लिये भारत का विकास मिशन था और उसके लिये एक विज़न था आज के इन “गांधी” के पास भी एक मिशन है पॉलीटिकल मिशन जिसके लिये वो कभी कभी “दलित टूरिज़्म “ पर निकलते हैं ।
Thursday, 13 August 2009
दलित टूरिज्म पर “ गांधी ”
बापू ने देश में आज़ादी की लड़ाई से पहले इस देश मे रहनेवालों और उनकी समस्याओं को करीब से देखना चाहा, उन्होने भारत भ्रमण किया, गांव- गांव, कस्बों-कस्बों में लोगों से मुलाकात की उन्हे महसूस हुआ कि भारत गांव में बसता है और अगर इसका विकास करना है तो पहले गांव का विकास करना होगा । इस बात को कई दशक बीत चुके,आज़ादी के बाद हमारी अपनी सरकार बनी,लगा सबकुछ बदलने वाला है बापू की बातें अब हकीक़त का रूप लेने वाली हैं । समय का पहिया घूमा भारत “इंडिया” में बदलने लगा । शहरों में उंची उंची इमारतें , आलीशान होटल्स , बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ बसने लगी । लोगों के रहन सहन में बदलाव आने लगा। लेकिन भारत तो वहीं का वहीं का रह गया गांव में । राजनीति में भी बदलाव आया, मुद्दे बदलने लगे,उद्देश्य बदलने लगे,कभी भारत की खातिर राजनीति हुआ करती थी अब भारत के सहारे राजनीति होने लगी । आज भी “गांधी “ निकलते हैं गांव के दौरे पर लेकिन एसी कमरों से । दलितों के घर में रात गुज़ारते हैं उनकी व्यथा-कथा पर अच्छा खासा भाषण देते हैं उनकी हालत पर अफसोस जताते हैं अफसोस की इस सूची में कभी कलावती तो कभी शशिकला का नाम जुड़ जाता है ये “गांधी “ अपने भाषण में ये बताना नहीं भूलते कि ये ग़रीब दलितों की पीड़ा है । इनकी इस हालत के लिये वो दूसरे दलों की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं । गांव में लोगों की समस्या सुन उसे दूर करने का आश्वासन देकर उड़न खटोले से वापस लौट जाते हैं । कलावती, शशिकला मीडिया के लिये खबर बन जाती है कोई इसे गरीब दलितों का हाल जानने का एक अच्छा प्रयास बताता है तो कोई इसे सियासत का हिस्सा । कलावती को आस जगती है कि अब उसका कुछ भला ज़रूर होगा, ऐसे में साल बीत जाता है लेकिन बदलता कुछ नहीं, हां राजनीति में कदम रखने वाले “गांधी” सियासत में परिपक्व होते जाते हैं, कब, कहां और कैसे राजनीतिक फायदे के लिये भारत की नब्ज़ पकड़नी है वो सीख जाते हैं । एक साल बाद “गांधी” फिर से गांव के दौरे पर निकलते हैं जहां इस बार विद्यावती उनका इंतज़ार कर रही होती है फिर से मीडिया कैमरों के फ्लैश चमकने लगते हैं ” गांधी ” गरीब दलितों की पीड़ा पर अफसोस ज़ाहिर करते है । विद्यावती को लगता है कि इस “गांधी” की तो केन्द्र में सरकार है जो हमारी तक़दीर बदल सकती हैं लेकिन विद्यावती को एहसास कराया जाता है कि राज्य में तो दलित मुखिया की ही सरकार है फिर भी तुम्हारी ऐसी हालत है, ऐसे में सरकार बदले बगैर वो उनकी ज्यादा मदद नहीं कर सकते । आज़ादी के बाद से दशकों तक देश में “गांधी” की पार्टी का ही शासन रहा फिर भी कलावती और विद्यावती को अपने हालात बदलने का अब तक इंतज़ार क्यों है ? इस पर “गांधी” खामोश रहते हैं । दरअसल इस गांधी के पास उसका जवाब नहीं क्योंकि इस “गांधी” और दशकों पुराने उस गांधी में काफी फर्क है वो महात्मा गांधी थे जिनके लिये भारत का विकास मिशन था और उसके लिये एक विज़न था आज के इन “गांधी” के पास भी एक मिशन है पॉलीटिकल मिशन जिसके लिये वो कभी कभी “दलित टूरिज़्म “ पर निकलते हैं ।
Sunday, 9 August 2009
राजनीति की खेती
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